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वो माथा चूम लेती है

Pushpendra Pal SinghPushpendra Pal Singh November 12, 2022
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“मेरी माँ”


मै जो रूठ जाऊँ तो

वो माथा चूम लेती है


थोड़ी देर जो ओझल हो जाऊँ तो

घर वो पूरा घूम लेती हैं


ज़रा जो - 2

कभी हुआ बीमार तो

सारे तीर्थ सारे धाम घूम लेती हैं


कड़ी धूप में वो

उसका जलना याद आता है

मुझे पेड़ की छाँव में सुलाना याद आता है


कैसे भूल जाऊँ मैं

उसका वो नोनी ghee की रोटी खिलाना याद आता है


जिसने उसको कभी भी

पैर की धूल बराबर भी ना समझा

उस जानवर के पैर दबवाना याद आता है


निकली जो “माता”

इक बार जो मुझको

पूरी रात उसका मुझको सहलाना


क्या क्या सपने देखे थे मेरी माँ ने

कहाँ से लाऊँ उसको मैं अब

उसका यूँ चले जाना याद आता है


आखिरी बार भी मैं देख ना पाया

जिंदगी हैं जिंदा भी हूँ

उसके साथ मेरे प्राण निकल जाना याद आता है


रचना:पुष्पेंद्र पाल सिंह


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