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क्या रहा बाकी अब

उस बरसात के बाद

यादें दफना दी गयी

आख़िरी मुलाक़ात के बाद


कुछ नहीं बहुत कुछ

टूटा है उन चूड़ियों के साथ

बिंदिया छूटी चुटकी छूटी

छाया अंधकार काजल मिटने के साथ


जड़ों में कुछ जड़ सा गया है

बूँद बूँद खून रिस रहा हैं

दिल में कुछ गड सा गया हैं

कुछ धुंधली सी

यादें पेन मेज़ कुर्सी बची है

ख़ज़ाना मेरी खुशियों का

कुछ यूँ लुट सा गया हैं


नाम भी उसका

लिख लिख कर क्यूँ मिटाऊँ मैं

ग़म सारे घोलकर साकी में

क्यूँ ना पी जाऊँ मैं


रचना:पुष्पेंद्र पाल सिंह

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