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भीड़ कहाँ है?


बिल्कुल खाली पड़ा है,

कोई दिखाई नहीं दे रहा इस रास्ते पर

बस कुछ सच्चे पेड़, नदिया, कुछ पशु पक्षी

थोड़े बादल थोड़ी मिट्टी जरूर. मिली हैं

अकेला हूँ मैं यहाँ

हाँ कुछ अच्छी आत्माए ज़रूर बैठी और अफ़सोस करती उदास सी दिखाई दे रहीं हैं कि किन और कैसे लोगों के लिए हम लड़े

एक बदबू सी आ रही है शायद जिसे लोग पैसे की महक कहते हैं

रचना :पुष्पेंद्र पाल सिंह

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