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अपाहिज बचपन :—


किससे, कैसे, कितना मांगना है, तरीके सब थे, सब दाव भी थे।

सलामत सिर नहीं उठता था बस, स्वस्थ हाथ भी थे, पांव भी थे।

बचपन की चमक तो नहीं दिखी लेकिन चेहरे पे कुछ भाव भी थे।

न पुरुषार्थ न कोई परिचित, दिखे नहीं पर भीतर कुछ घाव भी थे।


— पुखराज तेली | @poetpukhrajteli

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