माता-पिता's image
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मैंने ना देखा उन हाथों को कभी थकते हुए ,
मैंने ना देखा उन आंखों को झपकते हुए।
हर दिन रहती मन मेंंं कुछ बातें ,
जो मैंने देखा है उन्हें, रातों से बताते हुए।
जब भी होती वे आंखें गम से नम ,
ना देखा मैंने कभी उस पानी को छलकते हुए ।
लफ्ज़ तो अक्सर बयां करती हैं सब कुछ ,
मैंने देखा है उन लफ़्ज़ों को बातें सिलते हुए।
हर दिन बढते से जो कदम परिश्रम के लिए,
मैंने देखाा है कदमों को ,खुद के लिए पीछे हटते हुए।
वो और कोई नहीं हमारे माता-पिता है,
जिसेेेे हमने देखा है परिवार रचते हुए।

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