मुलाक़ात's image
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आसमान में जितने सितारे हैं,
उतना तुम्हारा प्रेम;
मेरे लिए।

सितारों के बीच जितनी छूटी जगह है,
उतना मेरा प्रेम;
तुम्हारे लिए।

© बाबुषा
#baabusha

उपरोक्त कविता मैंने सबसे पहले 2019 में योरकोट पर पढ़ी थी। पढ़ते ही पंक्तियाँ घर कर गईं और आज तक वहीं हैं। यह वह दिन था जब पहली बार मेरा परिचय बाबुषा कोहलीजी की कविताओं से हुआ, मन में जिज्ञासा बढ़ी और मैंने इंटरनेट खंगालना शुरू कर दिया और गूगल बाबा ने तमाम सोशल मीडिया के लिंक समक्ष रख दिये।
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एक के बाद एक कई कविताएँ पढ़ीं, घण्टों बीत गये पर मन और अँगूठा दोनों ही बस में नहीं थे, पहली कविता पढ़ते ही मन उस कविता के साथ रम गया और अँगूठा स्क्रीन पर दिखने वाली दूसरी कविता पर...
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बर्फ़ीली वादियों में पहली बार अपने हाथों से बर्फ़ छूने का सुख या सोते हुए किसी शिशु की मुस्कुराहट को देखने का सुख या रेडियो पर अचानक से अपने पसंदीदा गीत आने पर गुनगुनाने का सुख जो होता है, ठीक वैसा ही सुख मुझे बाबुषा कोहलीजी की कविताओं को पढ़कर मिलता है, उनकी कविताओं को पढ़ना और पढ़कर उसे महसूस करना ही अपने आप मे एक सुखद अनुभूति है।
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अभी हाल ही में रुख़ पब्लिकेशन (#rukhpublications) द्वारा प्रकाशित उनकी पुस्तक "भाप के घर में शीशे की लड़की" मुझे तोहफ़े में मिली और अपने पसंदीदा लेखक की किताब का तोहफ़े में मिलना ही एक पाठक के लिए दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत तोहफ़ा होता है।
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यह किताब, किताब नहीं, जीवन की यात्रा है, एक ऐसी यात्रा जिसका हर एक अध्याय ज़िन्दगी के उन पहलुओं को स्पर्श करता है जिसे छू कर ही आप इस यात्रा के रोमांच और प्रेम में आगे बढ़ते चले जाएँगे और इस ख़ूबसूरत सफ़र में आप मुख़ातिब होंगे उन तमाम विषयों पर जिसे आपने आज तक जानने और समझने की कोशिश की है और गर नहीं कि है तो मेरा दावा है कि इस किताब को पढ़ने के पश्चात आप जीवन को पहले से बेहतर जानने और समझने लगेंगे।
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यह सफ़र एक ख़ूबसूरत आरंभ और प्रार्थना के साथ, देखने और जानने की क्रिया से लेकर, सत्य और विश्वास को संजोये हुए एक ऐसा सफ़र तय करती है जो आपको जंगल, चिड़िया, पृथ्वी, पानी से होते हुए, बड़ा होना, बूढ़ा होना, छोड़ना, छूटना, ढूँढ़ना, लड़ना, आत्मबल, स्वीकारत्मकता, दोष एवं सेल्फ लव से रू-बरू कराती है और साथ ही घड़ी की चाल, स्वप्न, छुईमुई, त्यौहार, ऊँचाई, भीड़, एकता, ईश्वर, कविता, प्रेम और बुद्ध से आपका मिलाप कराती है।
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हर यात्रा में संगीत होता है, संगीत सरगम के बिना और सरगम स्वरों के बिना अधूरे हैं, "भाप के घर में शीशे की लड़की" वह संगीतबद्ध यात्रा है जिसके हर एक अध्याय में स्वरों सी कोमलता है, तीव्रता है, उतार है, चढ़ाव है। एक एक अध्याय आपको षड्ज, ऋषभ, गांधार, मध्यम, और पंचम तक के स्वरों का एहसास कराती है बशर्ते आपको भी बड़ी ही सहजता और सरलता से पढ़ने और मन से सुनने की जरूरत है।
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इस भाव को लिखते वक़्त मेरा मन किया कि किताब से कुछ पंक्तियाँ आप लोगों से साझा करूँ, पर मन नहीं माना, मुझे व्यक्तिगत रूप से यह सही नहीं लगा, मैं चाहता हूँ उनकी रचनाओं के किसी अंश को न पढ़कर उनकी पूरी रचना को पढ़ा जाना चाहिए, हो सकता है कुछ पंक्तियाँ शायद आपको रास्ता दिखा दें पर भाव के मंज़िल तक आपको पूरी रचना ही पहुँचा सकती है।
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अंत में एक बात कहना चाहूँगा यह लेख कोई समीक्षा नहीं है मेरे मन के भाव हैं, जो मैं आप लोगों से साझा कर रहा हूँ ताकि आप भी यह किताब अवश्य पढ़ें और इस बेहद ही सुखद यात्रा का अनुभव ले सकें।
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धन्यवाद!
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~ प्रशांत सिंह
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और हाँ, एक बहुत ही छोटी पर बहुत ही गहरी बात जो प्रसिद्ध कवि एवं कहानीकार प्रियदर्शनजी ने इस पुस्तक के उपरांत में कही है-
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"यह सच है कि बाबुषा कोहली की इन टिप्पणियों को कविता की तरह पढ़ने का मोह होता है। यह भी सच है कि इनमें बहुत गहरी काव्यात्मकता है। लेकिन इस कविता में उलझे रहे तो उसके पार जाकर वह संसार नहीं देख पाएँगे जो इस गद्य का असली अविष्कार है।"
~ प्रियदर्शन
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