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मंज़िल ना पा सका

Priyam DubeyPriyam Dubey August 25, 2022
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मंज़िल ना पा सका राह में ठहरा बहुत था
वो दिल मेरा जो उम्मीदों से भरा बहुत था

यूॅं तो ना थे ये मेरे ख़्वाब सावन में
पतझड़ से पहले ये जगह हरा बहुत था

मैं तो मांझा था मेरे ख़्वाबों के पतंग का
कटने से पहले ये पतंग लहरा बहुत था

किसपर इल्ज़ाम रखूॅं मैं अपनी नाकामी का
ग़लती तो मेरी ही थी कि मैं तेरा बहुत था

चलते-चलते राह भटक जाता था दिन में भी
बहाना बनाया ख़ुद से कि अंधेरा बहुत था

आज क्यों अकेला है एक कतरा सा समंदर में
कल तक तो साथ हॅंसने वाला चेहरा बहुत था

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