इंतक़ाम लूॅंगा's image
Poetry1 min read

इंतक़ाम लूॅंगा

Priyam DubeyPriyam Dubey June 28, 2022
Share0 Bookmarks 0 Reads1 Likes
इंतक़ाम लूॅंगा अपनी अनकही ग़ज़लों में
लब खोलूॅंगा पर गाली में नहीं ग़ज़लों में

यूॅं तो मैंने अश्कों से लिखा नहीं है मगर
दर्द छलक आया है कहीं-कहीं ग़ज़लों में

बेशक कुछ गीले-सिकवे हैं तुमसे तो
मैंने कर दिया शिकायत यूॅं हीं ग़ज़लों में

अरे अरे महफ़िल में इतना शोर क्यों है
बात कर रहा हूॅं ख़ुद से मैं हीं ग़ज़लों में

बाहर उनका शामियाॅं तबाह हो गया
यानी कि एक तूफ़ान भी बही ग़ज़लों में

तेरे जाने का ग़म यहाॅं किसी को ना हुआ
यहाॅं तो मेरी फ़ज़ाॅं रोशन रही ग़ज़लों में

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts