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तुम, मैं और कोरोना

Priya KusumPriya Kusum October 7, 2021
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तुम दूध हो तो मैं दही 

तुम खाता हो तो मैं बही 


तुम रसगुल्ला हो तो मैं जलेबी 

तुम ताला हो तो मैं चाबी 


तुम रस हो तो मैं मलाई 

तुम बिस्तर हो तो मैं रजाई 


तुम सागर हो तो मैं नदी 

तुम आसमान हो तो मैं धरती 


तुम सूरज हो तो मैं रोशनी 

तुम चंदा हो तो मैं चान्दनी 


तुम फ़ूल हो तो मैं महक 

तुम पक्षी हो तो मैं चहक 


तुम बाग हो तो मैं बहार

तुम हवा हो तो मैं बयार 


तुम बाह हो तो मैं हिलोर 

तुम तूफ़ान हो तो मैं लहर 


तुम बादल हो तो मैं बारिश 

तुम ज़रूरत हो तो मैं ख्वाहिश 


तुम आंसू हो तो मैं सिसकी 

तुम याद हो तो मैं हिचकी 


तुम दिल हो तो मैं धड़कन 

तुम हिज़्र (जुदाई) हो तो मैं तडपन 


तुम भँवरा हो तो मैं गुन्जन 

तुम शरीर हो तो मैं स्पंदन 


तुम धनुष हो तो मैं तीर 

तुम दर्द हो तो मैं पीर 


तुम कत्था हो तो मैं पान 

तुम बाबू हो तो मैं जान 


तुम नींद हो तो मैं सुकून 

तुम जीत हो तो मैं जुनून 


तुम कलम हो तो मैं लिखावट 

तुम त्योहार हो तो मैं सजावट 


तुम गीत हो तो मैं गज़ल 

तुम नयन हो तो मैं काजल 


तुम जल हो तो मैं प्यास 

तुम प्रेम हो तो मैं अहसास 


और इन दिनों, 

तुम मोबाइल हो तो मैं चार्जर 

तुम साबुन हो तो मैं सैनिटाईजर 


तुम डब्लूएचओ (WHO) हो तो मैं गाईडलाईन 

तुम असेन्शिअल सर्विसेज के कर्मी हो तो मैं क्वेरन्टाइन.

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