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तुम और बस तुम

Priya KusumPriya Kusum October 6, 2021
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तुम्हारी जिह्वा जब तुम्हारे अधरों से अठखेलियाँ करती है,

तेज हवा के झोंके से तुम्हारे गेसु जब तुम्हारे रुख़सार पर ढुलकते है,

आकाश की ऊन्चाई और समुद्र की गहराई लिए इन नेत्रों से जब तुम निहारती हो, 

तुम्हारे कानों की बालियाँ जो जहां तहां तुम्हें छू जाती हैं,

तुम्हारे माथे पर सजी वो छोटी मनमोहक बिन्दी,

इससे भी अधिक वो तुम्हारा वजह-बेवजह, बात-बेबात पर नन्हें बालकों-सा खिलखिलाना,

जब भी.. जब भी तुम्हारा ये दृश्य मेरे मानसपटल पर उभरता है,

कसम तुम्हारी, ये दिल थम-सा जाता है.. मैं वहीं का वहीं रुक जाता हूँ और ख्वाबो की उजली चादर बुनने लगता हूँ.

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