मृत्यु's image
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किसी ने मुझसे पूछा

क्या तुम्हें मरने से डर लगता है

मेरा जवाब था नहीं

क्योंकि डर मन का एक भाव है 

और मरने के बाद तो शरीर, भावनाएं 

सब समाप्त हो जाता है

मृत्यु के बाद क्या शेष है

ये हमें कहाँ पता है

बल्कि मुझे तो लगता है 

मौत नींद की तरह ही है

हम हर रोज़ सो जाते है

वह चेतना रहित अवस्था 

मृत्यु के समान ही तो है

फिर उसने पूछा कि मान लो

तुम किसी गहरे जंगल में खो जाओ

तुम्हारी गर्दन पर कोई खंजर रख दे

बहुत ऊँचे पहाड़ से तुम्हारा पैर फिसल जाए

उस वक्त तुम क्यों डरते हो

इसीलिए ना कि तुम मर जाओगे

मैंने कहा नहीं इसलिए नहीं

उस समय मुझे डर लगेगा कि 

अगर कोई जंगली जानवर मुझ पर झपटा

मेरी गर्दन पर चाकू चल गया

या मैं खाई में गिर गया 

तो मुझे 'दर्द' होगा

मुझे दर्द से डर लगता है मरने से नहीं

लेकिन मैं तुम्हें एक बात बताऊं

ऐसे तो दुनिया में कितने ही लोग

हर रोज़, हर मिनट, हर सेकेंड

काल के गर्भ में समा जाते है

पर मेरी आँखें शायद ही पनीली होती हो

अगर होती है तो महज कुछ पलों के लिए

मसलन दुनिया को अलविदा कह दे

मेरी कोई चहेती लोकप्रिय हस्ती

सीमा पर शहीद हो जाए कोई सैनिक

अथवा चला जाए मेरा कोई परिचित

लेकिन कुछ लोग है जो मुझे प्रिय है

जिनसे मेरा जुड़ाव एक भिन्न स्तर पर है

जिसे मैं शब्दों में बयां नहीं कर पाऊंगा

इनमें से कुछ से मेरा खून का रिश्ता है

तो कुछ से दोस्ती का और 

कुछ रिश्तों का नाम नहीं है

मुझे डर है कि इनमें से कुछ लोग

मुझसे पहले चले जाएंगे दुनिया से

और अब जैसे जैसे उम्र बीत रही है

ये बात मुझे ज्यादा ही महसूस हो रही है

कैसे सह पाऊंगा मैं उनके जाने का दुःख

वो पीड़ा,वो घुटन,वो बेबसी

वो भीतर को कचोटने वाला क्रंदन

दोस्त, मैं अपनी नहीं अपनो की मृत्यु से घबराता हूँ। 




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