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@WE THE JUDGE'MENTALS'


फर्ज़ करो तुमने एक इंसान को देखा

अभी तक सिर्फ़ देखा ही

कि तुरंत उसके शरीर के रंग

शरीर के अंगों की बनावट

शरीर पर पहने कपड़ों से

बनाने लग पड़ते हो तुम

उसके बारे में कई धारणाएँ


अगली कड़ी में

जैसे ही जुबान खोलता है वह इंसान

उसके कंठ से निकली भाषा या बोली

और उसमें बोले गये शब्दों के आधार पर

तुम उसे आँकना शुरू कर देते हो


इसके बाद

मिलती है उसके बारे थोड़ी और जानकारी

उसका नाम, उसका काम

उसका शहर, उसका गांव

उसकी जाति, उसकी ख्याति

उसके पल्ले अमीरी है या गरीबी

समाज में कौन है उसके करीबी

इससे पुख़्ता कर रहे होते हो अपनी राय


इन चंद मिनटों में चंद बातें ज्ञात कर

खींच दी है तुमने अपने मस्तिष्क में

उसके व्यक्तित्व की तस्वीर

मार दिया किसी और संभावना को

जन्म लेने से पहले ही

मन ही मन तय कर चुके हो

भविष्य में अपने और उसके संबंधों को


उसके प्रति तुम्हारी भावनाएं भी

इसी डाटा के अनुसार हो रही हैं नियंत्रित

उस इंसान से हर अगली मुलाकात पर

इसी डाटा को रिसाइकल करते हो

शायद ही कभी उसे

नये नज़रिए से देख पाते हो तुम


लेकिन मैं सोचती हूँ कि सदियों पहले

जब धरती सीमाओं में नहीं बंटी थी

जब परिवार, समाज, देश जैसी संस्थाएं न थी

जब इंसान के पास ना नाम था

और ना ही कोई औपचारिक काम था

जब वह कपड़े भी नहीं पहनता था

यहाँ तक कि उसके पास शब्द भी नहीं थे

थी तो कुछ अव्यवस्थित-सी ध्वनियाँ


क्या तब भी इंसान दूसरे इंसान के प्रति

बनाता होगा ऐसे ही राय और धारणाएँ

या बस महसूस करता था ये बात कि

धड़क रहा है जैसा जीवन मेरे भीतर

कुछ वैसा ही है इसके भीतर भी !








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