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चुनने का अधिकार

Priya KusumPriya Kusum October 6, 2021
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मैंने जीवन में दो तरह के पुरुषों को देखा, 


पहले वो हैं जो बांधना चाहते है

स्त्री को घर की चारदीवारी में,

सीमित रखना चाहते हैं उसका वजूद

खाना बनाने..परिवार-बच्चे संभालने तक,

जो उसकी हंसी को भी

 कैद कर लेना चाहते हैं बस अपने तक. 


दूसरे वो हैं जो चाहते हैं कि 

भूल जाए स्त्री रिश्ते-नाते 

त्याग दे प्रेम और ममता,

अपनी संवेदनाओ को परे रख 

सफलता का शिखर चूमे 

बुलंदी का आसमान छुए

व बन जाए आधुनिक. 


हो सकता है 

ऊपर जो मैंने कहा वो अति हो, 

पर इन दो अतिशय के नज़दीक ही 

झूलते पाया मैंने उन्हें. 


पर प्रिय,

स्त्री इतनी ठोस नहीं 

बेशुमार है उसके अन्तस के पहलु 

कभी वो सारे बन्धन तोड़कर 

उड़ जाना चाहती है, 

तो कभी पूर्ण समर्पण से भर 

तुम्हें टूटकर चाहना चाहती है.. 

कभी भाती है उसे ये दुनियादारी,

तो कभी कर्णो को मधु लगती उसे किलकारी.. 


परम स्वतंत्र तो कोई नहीं 

पर अगर किसी क्षण 

तुम निर्णयकर्ता हो, 

तो देना उसे 

'चुनने का अधिकार'

हक उसे वो होने का 

जो वो हो जाना चाहती है.

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