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माटी का पुतला

Prince TulsianPrince Tulsian October 18, 2022
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छू के मिट्टी को यें ऐतबार हुआ 
एक दिन इसमें ही समा जाना है ...
वक्त थमता है किसके लिए 
हर किसी का वक्त आना है ..

चिराग़ की रोशनी भी काफ़ी है 
ग़र आँखों में कर गुजरने की चमक हो ...
वरना तो रोशनी सारे जहां की भी कम है 
ग़र सीने में ना आग हो ना दहक हो ..

इंसान कब इंसान बना मालूम नहीं 
पर हैवानियत बख़ूबी अपनायी है ..
भेजा तो था तूने मासूम सी सीरत 
रब्बा यें कैसे दुनिया बन आयी है ..

हर कोई खोजता है ख़ुदा को मंदिर मस्जिद 
ना खोजे कभी खुद को कैसी है यह ज़िद्द ..
जो टटोल लेते खुद में थोड़ा झांक लेते 
अपने अंदर के बेचैनी को थोड़ा भाँप लेते ..
तों जीना कितना आसान हो जाता 
बेमानी घुस के बैठा गुमान भी सो जाता ...

हर बात की हद को पहचान लेते 
अच्छे के साथ बुरा भी जान लेते ...
मुँह में मिश्री ना हो तो ना सही 
पर तल्ख़ी को तौलने का ज्ञान रखते ..
कुछ बोझ उतार लेते जो 
दूसरों का देख खुद पर लादा है ..
क्यूँ राख की तरह जल जाते हो 
ग़र उसके पास ज़्यादा है ...
माटी की यह काया है 
माटी में मिल जाना है ...
वक्त थमता है किसके लिए 
हर किसी का वक्त आना है ...

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