करम's image
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बड़ी ही बेईमान है यें हसरतें 
जाने किस चीज़ पे दिल आ जाए 
भ्रम और संशय की लड़ाई में 
जाने किस ओर करवट खा जाए 

ईमान सम्भाले रखना साहेब यें
नेकी और बदी का फ़लसफ़ा है 
पकड़ के रखना अपने सारे करम 
हाथों से रेत की तरह फिसलता है 

देखा है हमने तबाही गुलिस्ताँ 
बाग़ भी सिसकियों की गवाही करता है 
लोगों की आह पर महल बनते नहीं 
छीन के हक़ कहा सुकून पड़ता है 

ना देना धोखा के हिसाब होता है 
ज़मीर यूँ ही हलक़ होता है 
पोंछ लो कितनी भी लकीर हाथों की 
किए का कालिख कहा साफ़ होता है 

ना दुखाना दिल किसी का साहेब 
बद्दुआ नस्लों को जला देती है 
कमायीं जो ईमान कि दौलत
ज़िंदगी सजदे में सर झुका लेती है 

ना समझना कमजोर अदब वालों को 
पानी इठला के झरनो से बह जाता है 
लेता है जब यही पानी रूप रोद्र 
कतील सैलाब बन बस्तियाँ निगल जाता है 

गुमान ग़र तुम्हें ज़रा भी खुद पर है 
तो एक बार दिल में झांक लेना 
लूट के दौलत कहा जाओगे 
लिखा तो है जल के ख़ाक होना 

यही है सच, यही आख़िरी सच्चाई 
मिट जाना, हस्ती का राख होना 
ज़िंदगी का बस यही अफ़साना 
लिखा तो है जल के ख़ाक होना ..
मिट्टी तले या जल के ख़ाक होना …

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