नारी's image
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शब्दों के बाण से भेदी गई थी,
कटाक्ष ध्वनि कर्ण में गूंज रही थी।
प्रतिकार कर सकती शब्द प्रत्यंचा खींच!
मौन रहकर विध्वंश को रोके खड़ी थी।।

खामोशी से आंधियों को रोकती थी,
हवा के रुख के साथ बही थी।
सही वो थी या विद्रोही नारियां!
अपने अपने रास्ते में आघात दोनों सही थी।

भावनाओं के बाढ़ रोके बांध सी खड़ी थी,
तोड़े बांध तो बाढ़ की आरोपित बनी थी,
ना सहना ना बहना था आसान उसका!
दोनों हीं रूप में इंक़लाबी नारी अडिग खड़ी थी।

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