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हम नें कितना खोया हैं ये समझाना मुश्किल हैं

PRAVEEN BHARDWAJPRAVEEN BHARDWAJ September 14, 2021
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हम नें कितना खोया हैं ये समझाना मुश्किल हैं

जितना उसका मुझकों दोस्त बताना मुश्किल हैं


उसके साथ इतना दूर निकल आया था की अब

उम्र बीत जायेगी मग़र लौट के आना मुश्किल हैं


जितनी तेज़ी से रेल चले उतना ही ग़म बढ़ता हैं

जाना तो आसान हैं पर हाथ हिलाना मुश्किल हैं


हमनें देखा सबकुछ पर दो ही चीजे मुश्किल थी

प्यार छिपाना मुश्किल हैं दर्द छिपाना मुश्किल हैं


जाने वालों जाओ भी हमको तो ये मालूम ही था

इन मुश्किल हालतों में साथ निभाना मुश्किल हैं


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