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दर्द की ख्वाहिश थी की आराम मिले

PRAVEEN BHARDWAJPRAVEEN BHARDWAJ September 14, 2021
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हम चाहते थे कि मुझे उस का पैग़ाम मिले

यानी दर्द की ख्वाहिश थी की आराम मिले


एक ज़िन्दगी थी जो गमों के पास ही गुज़री

हमारी इस सब्र को भी उस का इनाम मिले


हारने का ग़म नहीं जितने की खुशी क्या हो

हमें तो मतलब हैं की हमें बस अंजाम मिले


हमारे हिस्से से अब कुछ नहीं चुराया जाये

हो किस्मत में ग़म की शाम फ़िर शाम मिले


कामगारों से उनका हाल मत पुछो कैसा हैं

हम बेरोजगारो को तो बस कुछ काम मिले

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