संध्या's image
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ए शाम ,तू क्यों खामोश खड़ी है ,

जिंदगी थकी मांदी घर लौट रही है।

सबकी मिलन, तेरी बिछोह की घड़ी है।

उत्कंठा यह सूरज को विदा करने की है,

सिमट जाने को उस रात में जो सूनी पड़ी है।

ए सूरज , तेरे प्यार में कुछ ऐसे खो गई,

खबर ना लगी, कब मैं संध्या हो गई।

अभी तो तुम्हारा प्रणय निवेदन स्वीकारा था।

तुम्हारे सुनहरे प्रभामंडल को निहारा था।

घुंघराले बादलों से उदित लालिमा,

उतरी थी दिल की गहराई में।

अलसाई सी खड़ी थी ,मैं अपनी तरुणाई में।

कभी अमराई की ओट से ,

छिपे हुए कभी बादलों के छोर से,

यूं छुप के देखते हुए तुझे ,जब मैं देखती ,

शर्म की लाल चुनर मुख पर ओढ़ लेती।

हे उषा के चितेरे, तेरे चितवन से ,

सजीव हो उठा था मेरा उपवन ।

दामन तेरा थाम, हुई तेरी सहचरी,

साझा करने सुख दुख ,ले सात कदमों की सप्तपदी,

हेमंत की सर्द दुपहरी, जब था तू निर्बल,

ठिठुरती सी मैं खड़ी, देती तुझको संबल।

दहकते ग्रीष्म सा ,जब तेरा यौवन था प्रखर ,

तेरा ताप मैंने सहा, हृदय और नैनों में भरा,

तुझमें मैं ऐसी खोती गई ,

मैं संध्या होती गई।

भावना का थाल लिए ,रात के गलियारे में,

संध्या जब आगे बढ़ी,

चांदनी से नहाई फिर भी,

रात और गहरी हो गई।

ऐ सूरज तेरे प्यार में , मैं कुछ ऐसी खो गई ,

खबर ना लगी ,कब मैं संध्या हो गई।








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