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मनोव्यथा सूनी गोद की

Prakriti AgrawalPrakriti Agrawal July 24, 2022
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गरजता बरसता सावन आया।

मनभावन आया ।

प्यासी धरती जो थी कुम्हलाई ,

हृदय में आकांक्षा और दित्सा भर आई।

गगन ने बरसाई रसधार,

धरती ने दिया अपना सर्वस्व वार।

माटी में पहले ना थी सुगंध ,

पानी में भी ना घुला था मकरंद ,

मिलन की है यह सुवास ,

सोंधी सोंधी वायु हुई आज ।

भाषा से परे शब्द हुए मुखरित,

मधुरिम स्वप्न हुए अंकुरित ।

धरती ने चित्ताकर्षक गीत गुनगुनाया,

प्रणयातुर गगन धरा पर उतर आया।

विकलता को मिली स्थिरता,

नैनों में भर आई आर्द्रता ।

धुल गया सारा विराग ,

प्रकृति का हुआअलौकिक श्रींगार ।

हरित साड़ी ,

फूलों की किनारी ,

लताएँ हर्षाईं,

अम्बर को समेटने बाहें फैलाईं।

क्षितिज पर इंद्रधनुष का हिंडोला ,

डाल गगन धरा संग झूला ।

नीला गगन हो रहा मगन ,

पुलकित धरा ,उर्वर जीवन ।


विस्तृत धरती का इक कोना ,

बना नीरवता का बिछौना,

कठोर हुआ अनंत अंक,

कड़क कड़क बरसा गगन।

विद्युत बन बरसा घन ,

धूल धूसरित हुए सारे स्वप्न ।

अम्बर से बरसे अग्नि तारे ,

अंगार बन धरणि उर उतरे ।

विरह ने पैर पसारे ,

विषाद से भीगे नयनतारे ।

सूना सा सन्नाटा ,

सुलगता हुआ जीवनहाता ।

कांटे से बने अस्फुट बीज,

बिखरा छितरा, पंक कीच ।

सिहर उठा धरती का आंचल ,

सूख गया दुग्ध सरिता जल ।

सहमे बैठे विहँग दल ,

छिपा पंख नीचे शिशु कोमल ।

कुलांचे भर मृगी छौने संग ,

ओझल भई जा विपिन गहन ।

नहीं कुछ अंकुरित ,

नहीं एक हरा सा तृण।

झरि झरि अवनी नेत्रवारी ,

निर्जन कोख छुपाती ,बिच सारी ।

धुआं हुए धरती के अश्रु ,

कारा कारा हुआ व्योम विभु।

छाया चहुंओर तिमिर घनघोर,

मरूभूमि सा हुआ धरती का कोर।

अनुभूतियों से भरी अभिव्यक्ति ,

बन्ध्या हुई, ममता भरी शक्ति ।

कैसा आया रे! सावन मनभावन।

बन कर ,अश्रुओं का प्लावन ।

अश्रुओं का प्लावन ।

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