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आओ एक कथा सुनाऊं
उस बिचारे साबुन की , 
नीम , गुलाब और चंदन
वाले साबुन की ।

खरीद रहे है बड़ी तादात 
में इसे सब लोग , 
देहिक रूप निखारने के लिए 
करते सब मंद इसका प्रयोग ।

शरीर पर लगते ही सब के 
पिघल कर बन जाता है ये झाग , 
खुद पिघल कर भी मिटाता 
शरीर पर लगे वो सारे दाग । 

अगर नहाते वक्त गिर जाता 
नाली में ये साबुन , 
उसे क्षण तीखी  तीखी खाता 
गाली ये साबुन ।

घिसते घिसते हो गया 
पतला और छोटा साबुन , 
साबुंदानी में आया नया 
बड़ा और मोटा साबुन । 

नए साबुन पर चिपका दिया 
इस पुराने साबुन को , 
इतना प्रयोग करके भी बेइज्जत 
कर दिया इस बिचारे साबुन को ।

                                      ~ प्रखर त्रिपाठी

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