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ज़माना भाव से 'तर्कों' की चौखट आ गया देखो

Pradeep Seth सलिलPradeep Seth सलिल October 4, 2022
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'ज़माना 'भाव' से 'तर्कों' की चौखट आ गया है अब'



नहीं लिखता है ख़त कोई किसी क़ागज़ पे स्याही से

हमें मोबाइल पे उंगली चलाना आ गया है अब।


मोहब्बत ‘हाय’ से चलकर ठहरती ‘बाय’ के दर पर

ज़माना "भाव" से "तर्कों" की चौखट आ गया है अब।


वो जज़्बातों में खो जाना वो पहरों की मुलाकातें

कहानी में किताबों में सिमटकर आ गया है अब।


अधूरे ख़्वाब का बिस्मिल समूचे ख़्वाब का नग़्मा

कहीं पर खो गया ये सब नया युग आ गया है अब।


झरोखे का जरा सा पट खुला रखना तनिक तकना

गये वक़्तों की बातें हैं मोबाइल आ गया है अब।


--प्रदीप सेठ सलिल

बिस्मिल=आहत/घायल

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