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वो पहरों तक मुलाकातें वो लड़ना फ़िर से मिल जाना.....

Pradeep Seth सलिलPradeep Seth सलिल December 31, 2021
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'वो पहरों तक मुलाकातें वो लड़ना फ़िर से मिल जाना'


वो ख़्वाबों में विचरने की सुहानी याद आती है,

बसों की सीट से जन्मी कहानी याद आती है।


किसी दिल के समुन्दर में तू बन के मौज आती थी,

वो पुरनम मौज की हलचल, नूरानी याद आती है।


वो पहरों तक मुलाकातें वो लड़ना फ़िर से मिल जाना,

तेरे चेहरे की नटखट शादमानी याद आती है।


छिपाना ज़िल्द में ख़त का, किताबों को हवा देना,

बदलना फिर किताबों का,  रूमानी याद आती है।


वो कहना ख़र्च ग़र होगा बराबर बांट लेगें हम,

गणित के जोड़-तोड़ में शैतानी याद आती है। 


सुबह ख़िड़की के कोने से गली में बारहा तकना,

झरोख़े से नज़र की मेज़बानी  याद आती है।


यहाँ छोटी सी गुलवारी में अब न ख़ार है कोई,

फ़िज़ाओं की हवाओं में वीरानी याद आती है।

--प्रदीप सेठ सलिल.

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