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'वह लोग हाथों में इश्तहार उठाए'

Pradeep Seth सलिलPradeep Seth सलिल December 14, 2021
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"वह लोग हाथों में...."


वह लोग हाथों में इश्तहार उठाए

मुंडेरों पर चढ़ने लगे हैं


अब

कुछ भी पर्दे में नही रह पाएगा

खिड़कियों से कूदने लगेंगे नारे

शून्य में


जो

मनुष्य के विरुद्ध

युद्ध का संचालन कर रहे हैं

छिपकर

वायदे के तम्बूओं में बसे माध्यम से।


आज रोटी की लड़ाई

तब्दील हो गई है

अस्तित्व की जंग में


और वह समझने लगे हैं

कि उनके ही जलस्रोत का पानी

बेचा जा रहा है

एक अदद उम्र के बदले।


वह जो बायाँ हाथ पीठ पर रख

झुके रहे दरबार में

पीढ़ी दर पीढ़ी


बढ़ाने लगे हैं क़दम

उन सड़कों पर

जो गांवों को नही छूतीं

पर 

जिनसे ही जाते हैं आंकड़ें

फ़ाइलों की जिल्द में

वहाँ तक,


फ़िर

बांट दिए जाते हैं बदस्तूर

अख़बारों के हाशियों पर

टीवी चैनलों पर -ख़पत के लिए,


चला दिए जाते हैं लफ़्जी कारतूस

जलसाघरों से,


अब वो जानते हैं

कि

अंकों का आधार बदल देती हैं

छिपी नस्लें

अपनी रक्षा पंक्ति की व्यवस्था के लिऐ

ज़रूरत के मुताबिक।


दृष्टि दूर तक देखने लगी है कुहासा चीरकर

उस पार,

जानने लगी है

इस बार,


कि

ख़रीदी जाती हैं आबादियाँ उत्पादन के साथ

भवनों के लिए,

स्थापित किए जाते हैं कीर्तिमान ऊचाइयों के

ग्राफ़ पेपर पर

कि देश उन्नति कर रहा है,


पर वो चुप नही होगें अब

पलटने लगें हैं पृष्ठ

औसत के सवाल समझने को,

फिर उठा लेते हैं हाथ चुनावी जंग में,


उनके खिलाफ़ 

जो

संचालन कर रहें हैं

मनुष्य के विरुद्ध युद्ध का

आंकड़ों से।



--प्रदीप सेठ “सलिल”

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