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"पढ़ना लिखना थम्ब के जितना........"

Pradeep Seth सलिलPradeep Seth सलिल July 29, 2022
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"स्वप्न बिके बेभाव"


आसमान से सुबह उतरकर,

आ पहुंची फुटपाथ पर,

मिले दुखों को पाँव,

ग्रहण लगा इस गाँव।


संकरी बस्ती ठौर ठिकाना,

रोटी का सब ताना बाना,

पढ़ना लिखना,

"थम्ब" के जितना-

सूखे में पानी का दिखना,

झण्डा लिखता भाग

सहरा में है नाव,

बिखरे सारे ख़्वाब।


भूख बीजने लगी पसीना,

रहन हो गया मरना जीना,

व्यथा पीटती रही ढिंढोरा

वैभव, हाकिम बना निगोड़ा।

इस बस्ती का भाग कतर कर,

जो पहुँचे उस घाट,

उनके अपने चाव,

स्वप्न बिके बेभाव।


किरणों की सारी तरुणाई,

महंगे दामों ही बिक आई,

मौन हुआ यों अपना कलरव,

अब केवल चुप्पी से मतलब।

जिस गलियारे खुशी बरस कर

बैठी दिनभर रातभर

उनको प्रातः रास,

काजलसम अपना गाँव

आँचल में काली छाँव,

मिले दुखों को पांव।


--प्रदीप सेठ सलिल

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