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'ओ स्नेहमयी आकृति.....'

Pradeep Seth सलिलPradeep Seth सलिल March 1, 2022
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"तुम्हें ही समर्पित हैं"


ओ! हवाओं सी निराकार आकृति

मेरे तसव्वुर की,

तुम्हें अर्पित है

सुबह की पहली किरण

युग युगांतरों के लिए,


जीवन की दहलीज़ पर

ओ! पृथ्वी सी चंचल

निरंतर नृत्य करती आकृति

समर्पित हैं

तुम्हें


फूलों की सुगंध

वक्त के झंझावाती क्षणों के मध्य,


तुम्हें ही समर्पित हैं

पर्वतों की ऊंचाइयाँ-

नेतृत्व में

तथा

स्नेहिल संवेदित भावनाऐं-प्रकृति सी।


और

पल-पल बित्ता-बित्ता

बढ़ती ख़ुशियों की लताऐं

तुम्हारे ही द्वार सज जाएँ

लद जाएँ

ओ स्नेहमयी आकृति

मेरे तसव्वुर की।


---प्रदीप सेठ सलिल


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