'लो होली आ गई निगोड़ी  चुपके से ही रंग लगाना''s image
Love PoetryPoetry2 min read

'लो होली आ गई निगोड़ी चुपके से ही रंग लगाना'

Pradeep Seth सलिलPradeep Seth सलिल March 18, 2022
Share1 Bookmarks 82 Reads0 Likes



लो होली आ गई निगोड़ी

चुपके से ही रंग लगाना।

×××


लो होली आ गई निगोड़ी

अबके कान्हा तुम न आए,

देखो जल्दी ही आ आना

चुपके से ही रंग लगाना,

-यदि रंगना ही है मुझको।


जग वाले कर रहे ढिंढोरा 

मुझपर जोबन बलिहारी है,

गांव गांव कैसे जा सकती

यह जोबन मुझपे भारी है,

-क्यों आया यह जोबन मुझको।


सखियाँ मार रहीं पिचकारी

संशय से, दुविधा से हारी,

भला सखि से कैसे कह दूँ

 उनको ‘बरसाने’ ले आ री,

-स्वम् आना रंग जाना मुझको।


दुखिया मन कैसे समझाऊँ

कौन ठौर मैं  विरहा गाऊँ,

न जानूँ तुम कौन डगरिया

कैसे मैं पाती पहुँचाऊँ,

-देखो तुम ले जाना मुझको।


सखियाँ जग से नयन बचाए

पूछ रहीं “वो” क्यों न आए,

तुम  मेरे अंतर  की  वाणी

कौन ह्रदय उनको समझाए,

-ह्रदय कहाँ अब मेरा मुझको।


कारा लोक लाज की गिरधर

नगर डगर कैसे जा ढूंढू 

तुम्हीं श्वास-गति स्वम् आ जाओ

तुम्ही आस मैं तुमको पूजूं,

-रंग न भाते तुम बिन मुझको,

 तुम बिन होली कैसे भाये। 


लो होली आ गई निगोड़ी 

अबके कान्हा तुम न आये।


 --प्रदीप सेठ सलिल

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts