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'किन्तु यादों की पुस्तक में सूखे फूल न देखे होंगे'

Pradeep Seth सलिलPradeep Seth सलिल January 20, 2023
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“पर तुमने मन-द्वार किसी के बुझते दीप न देखे होंगे”



मधुर मधुर अधरों की हाला

मान लिया छलकाई होगी,

अलकों में उलझी तरुणाई

मन्द मन्द बिखराई होगी,

लेकिन झुकी पलक के आंसू बहते कभी न देखे होंगें।


दर्पण से शरमाई होंगीं

नजरें लाख़ चुराई होंगीं,

भाव भरे बन्धन अर्पण की

पी मदिरा मुस्काई होंगीं,

लेकिन पीड़ा पीने वाले अश्क़ कभी न देखे होंगें।


संध्या नयन सजाती होंगी

गजरे में गुंथ जाती होंगी,

बन मौसम की राजकुमारी

अलसाई इठलाती होंगी,

किन्तु यादों की पुस्तक में सूखे फूल न देखे होंगे।


मेहंदी रची हथेली होगी,

सिन्दूरी यौवन भी होगा,

प्रिया प्रणय-पूजा अपनाने

सुन्दर मिलन शिवालय होगा,

पर मन्दिर मन्दिर दरवाज़े बन्द कभी न देखे होंगे।


मन का दीप जलाया होगा,

अर्चन नित्य चढ़ाया होगा,

किलकारी के बाल स्वरों में

बंधन

का सुख पाया होगा,

पर तुमने मन द्वार किसी के बुझते दीप न देेखे होंगे।


कंगना तनिक बजाया होगा,

श्रद्धा भाव जताया होगा,

निज अपनी परिधि पा जीवन

दिन दिन स्नेह बढ़ाया होगा,

दूर किसी आंगन मुरझाते स्वप्न कभी न देखे होंगे।


--प्रदीप सेठ सलिल

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