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'जुगनू तराशा और फ़िर अंजुम बना दिया.....'

Pradeep Seth सलिलPradeep Seth सलिल January 3, 2022
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"जिल्द के अंदर भी--एक सुबह,"

-नया 

-क्या है

-साल मुबारक



उसने तो संगे-ए-राह को साक़िब बना दिया,

जुगनु तराशा और फिर अंजुम बना दिया।


क्या  हुआ तब्दील ,  पसीना तो वहीं है ,

लोगों ने किस हिसाब तमाशा बना दिया।


ये  जश्न मुबारक  के नया साल  है तारी,

धुऐं में रोशनी का एक मंज़र बना दिया।


गिनती का  हेर-फ़ेर उसे कुछ  नया नहीं,

लोगों का शौंक ये, के कलैण्डर बना दिया।


"ज़र्रा" सही पर वो किए है, चांद सर जनाब,

पुर्जे की कैफ़ियत है, 'मैं' को 'हम' बना दिया।

---प्रदीप सेठ "सलिल"

 


संग-ए-राह=रास्ते का पत्थर

साक़िब=प्रकाशमान

अंजुम=सूर्य

तारी=प्रकट होना

सर=जीतना (CONQUER)

क़ैफ़ियत=विवरण

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