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'हो सके तो मुझमें दिखना'

Pradeep Seth सलिलPradeep Seth सलिल October 15, 2022
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"तरक्की के साए में"


सुनो

जिन्हें 

दाना-पानी देकर पाला था

अंकुर से दरख़्त में ढाला था,

वो पक्षी-

मुंडेर तक आते हैं

रस्म-अदाई कर जाते हैं।


आकाश संपन्न हो गया है

कोमल चांद कहीं खो गया है,


इधर

मैं ठीक हूं

देखो

तुम चिंता न करना,


यहाँ

समय के इस पार

आँखें खोजती हैं

उसे

जो आसपास है

परछाईं का आभास है।


प्रश्न उछलते हैं

इश्तहारों में, अखबारों में

खबरों में नगरों में,

तरक्की के बीच,


‘तरक्की के बीच’

बंधता है कोई

नीति में

अपने दायरे की परिमिति में,


सुनो

मैं इस गाँव अच्छा हूँ--लोग कहते हैं,

तुम कैसी हो लिखना

हो सके तो

सदा ही

मुझमें दिखना।


--प्रदीप सेठ सलिल

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