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"छज्जों से छत्तों से गर्मी आँगन तक आई"

Pradeep Seth सलिलPradeep Seth सलिल June 10, 2022
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"गर्मी का रथ"


छज्जों से, छत्तों से  गर्मी  आंगन तक आई,

जेठ मास के रथ पर चढ़कर  दिल्ली गरमाई।


बंद हुआ स्कूल  चलो नानी मामी के द्वार,

मौसा-मौसी  फ़ूफ़ा-फ़ूफ़ी  के रौनक  आई।

छज्जों से छतों से-----


सत्तू घोलें  शरबत पी लें

ख़ीरा ककड़ी के संग जी लें,

देखो लीची रानी राजा आम साथ लाई,

छज्जों से  छतों से-------


खरबूजा, तरबूज मटक कर सड़कों पर आए

इतराई  ठण्डाई  छम-छम घर-घर  पसराई,

छज्जों से छतों से गर्मी-----


हाल हुआ बेहाल

निकट सिर के सूरज आया,

धूप ओढ़ कर हवा दुपहरी में सर सर आई 

छज्जों से छतों से गर्मी-----


हरपल चुप-चुप तापमान का क़द बढ़ता जाता,

घटते घटते  छोटी  होती  अपनी  परछाई ,

छज्जों से छतों से गर्मी------


बहा पसीना मुश्किल जीना  है  त्राहि त्राहि

ॠतु की बेटी, गर्मी बनकर ठुमक ठुमक आई,

छज्जों से छतों से गर्मी----


इस पर बिजली के नख़रे और तानाशाही तेवर,

बस्ती  के  खंबों  से  फुर्र  है  बैरन  हरजाई,

छज्जों से छतों से गर्मी----


-प्रदीप सेठ सलिल

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