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परदे के उस पार
रहती है कोई जिन्दगी I
इसका नही था कोई इल्म मुझे
शायद मुझे कभी दिख नही पाया
उनके अविराम गर्दिशों का साया ।
एक दिन सहसा
उस अबोध बच्चे की जिद ने
हटा दिया वो परदा
जिसकी आड़ लेकर
सिसक रही थी बेबस जिंदगी ।
बरसों की उसकी तपस्या का फल
ऐसा भी हो सकता है
कभी सोचा ना था मैने ।
गैरों को सहारा देकर
उठने वाले उस जवान के कंधे
गिर जाने की इतनी बड़ी सजा मिली ।
अकेली कहानी नही है बस यही
परदे के उस पार
जी रही है ऐसी कई जिन्दगी 
जिनकी ओर नही उठते कोई कंधे ।
जीत पर मेडल टंगाने वाले नर नारायण
अब बैकुण्ठ में रमें बैठे हैं 
काश ! ये परदा ना बना होता
दिखाई तो देती ये सच्चाई उनको
जो देशभक्ति का दम्भ भरते हैं l
जैसा भी हो लेकिन
वो बेजान परदा बचाकर तो रखता है
मर्यादा की सीमारेखा मे
जिसकी कीमत आज भी ज्यादा है
उन सिक्कों की खनक से
जो बिछाए जाते है अपने धर्म के नाम पर ।।




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