वीर सुपूत's image
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वक्यितव उनका व्यक्त होता मुख से उनके आग बन,
ये सोच दुश्मन न लड़े,  रह जाए कहीं न राख बन,
न सर हुआ ऊंचा कभी, जो देश को हानि करे,
रक्षा प्रमुख ऐसा जहां, वहां कौन ही आगे बढ़े,

विशिष्ट अति विशिष्ट क्या, हर ओहदा उनके पास था,
डंका था युद्ध में बोलता, यश ही उनका ग्रास था,
थे वीरता की मूर्ति, शोर्य उनके साथ था,
मात्र वो इंसान थे, जिसने बदला इतिहास था,

शांतिदूत कई देशों के, कई वार्ता के भाग थे,
तीनों बलो में उच्च वो, धरती का सौभाग्य थे,
छोटे शहर में थे पले, पर काम सब ऊंचे  किए,
जब तक तन में प्राण थे, सर देश का न झुकने दिए

ये खून में था, देश की सेवा ही जीवन धार है,
भारत का हर कतरा उनका,जन्म सिद्ध अधिकार है,
हिंद की सीमा पे रुख, जिस देश ने जब भी किया, 
आंखें दिखा पीछे हटा, दूर दुश्मन को किया,

नम है आंखें देश की,जो वो विदा है कर चले,
मजबूत मूरत देश की, उनकी कमी हर पल खले,
शत शत नमन उस पूत, को जिसने दिया इतिहास रच,
वो एक थे अनेक में न झुठला सके कोई ये सच

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