स्निघता's image
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स्निघता की कोमल लहरें क्या उठती है तेरे मन में,
अकसर ये सबसे कहती हूं भूल करो इस यौवन में,
जो भटका न वो क्या जाने दीदार ए आलम दिलबर का,
जादुई सा सब लगता है एक कसक उठे है तन मन में

स्पर्श से उनके रोम रोम अंगड़ाई लेने लगता है,
आलिंगन में उनकी धड़कन का राग सुनाई देता है,
दिल करता है समय कहीं दुबक के पीछे हट जाए,
कुछ अनजाने रस्तों पर हम चलते हुए भटक जाएं

नजरे लगती है बाण हमें जो दिल पर सीधा वार करे,
हर पल हर क्षण ये चाहे बस उनका ही दीदार करे,
क्यूं पूरी तुझ संग लगती हूं पूरी होकर भी न जाने,
खुशियों का सूरज तुझसे दूर अंधेरों में जा छिपता है

तुझको मैं नदिया बन ,खुद में नाव सा बहने देती हूं,
तेरी परछाई के तिनकों को सपनो में बुन लेती हू,
तेरे आने से लगता है दुनिया जैसे बेमानी है,
जीवन अब कुछ और नहीं बस मेरी तेरी कहानी है

तेरे अल्फाजों की बोरी हम साथ हमेशा रखते है,
जो साथ जिए बस वो पल ही अब मूल्यवान से लगते है,
तेरी दूरी से कतरा कतरा मेरी निशानी बहती है,
नैनों की बरखा बरस बरस अब मेरी कहानी कहती है

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