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दुष्कर्म

PoonamPoonam May 29, 2022
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एक नन्ही सी कली, आंगन में बहार बन आई,

नजर से बचने को मां ने, स्याही बार बार लगाई,

चलने लगी लड़खड़ा तो, पेरौ में पायल पहनाई,

हो भी ओझल ज्यों नजरों से, धनक रहे सुनाई,

थी वो लाड़ली बाबा की, थी मां की वो परछाई,

चेहरे की मुस्कान से उसने, ना होने दी रूसवाई,

नया खिलौना नयी फराक, जाने कितनी दिलवाई,

अपनी हर एक जिद्द भी उसने, बाबा से मनवाई,

स्कूल में भेजी गुडिया रानी, सिखन को नयी कहानी,

पढ़ा लिखा के सभय बनाना, मां बाबा की थी मनमानी,

पांच जमात ही पार करी थी, बालकपन से ना उभरी थी,

मासूम सी कोमल सी वो तो, अल्हड़पन की गगरी थी,

नियती ने एक पलटी मारी, मानो खुशियां छीन गयी सारी,

उठा ले गए कुछ दानव मिल, छीन लिया बचपन कोमल,

वो रोती थी चिल्लाती थी,आवाज दबा दी जाती थी,

किस्मत की वो एक मारी थी, उस जैसी अन्य बेचारी थी,

उनकी आंखों में सपने थे,आसपास जब अपने थे,

दर्द सहा अपमान सहा,उस कोपल ने दुषकाम सहा

एक टक अंबर वो तकती थी, आंसू की डोर ना रूकती थी,

इक आहट से डर जाती थी, मानवता अब ना भाती थी,

आशाएं टूटती जाती थी, उम्मीद छूटती जाती थी,

दर्पण के आगे हस्ती थी, अब छाया भी ना दिखती थी,

मां रोती बांट ही तकती रही, बेटी के विरह में जलती रही,

जिसने छीना उसका अभिमान,कोई और नहीं, हैं हम इंसान

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