भुलेखा's image
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जाग उठा एक सोया सपना,
जो मैने तुमने देखा था,
शून्य वही था क्षितिज वही था,
न लगा कभी भूलेखा था

माटी के बर्तन से हम ढलते,
दूर निकल गए थे चलते,
खुशियों के महल बनाने का,
सपना एक हमने देखा था

आकार दिया अल्हड़पन को,
लक्ष्य दिया इस जीवन को,
एक सच बोलो मुझ में ऐसा,
भी क्या तुमने देखा था

क्यूं धुंधले धुंधले लगते हो,
न सुनते हो ना दिखते हो,
फिर क्यों तुम जिंदा लगते हो,
क्या जाल ही मुझ पर फेंका था

जाग उठा एक सोया सपना 
जो मैने तुमने देखा था

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