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अवसाद हैं आघात हैं अनगिनत अपराध हैं,
जीवंतता का अंत या जीवन की ये शुरुआत है

रेल की रफ्तार सी पटरी बदलती जिंदगी,
इस दल बदल के खेल में सब के अलग अनुवाद है

लक्ष्य के मेले लगे, ना होड़ का कोई अंत है,
क्या जिंदगी की दौड़ ही सुख की नई बुनियाद है?

शोर गुल है साथ भी, फिर चीखती क्यों जिंदगी,
सुख चैन को बौना बना गमों का ये आगाज है

कुछ पल सुकून से बैठ कर खुद से ये पूछो कभी,
क्या सच को काबू कर रहा कोई झूठ का मिराज है

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