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कभी चटक जाते है रिश्ते शीशे की तरह

संभाल के रखो, बचाकर के रखो इन्हें दुनियां की नज़रों से 

कुछ ना कहते हुए भी बहुत कुछ कह जाते है 

ये अनसुलझे धागे की तरह

जोड़ने की कोशिश में गाठें 

पड़ जाती है इनमें

बहुत नाज़ुक होते है ये सम्बंध धागे की तरह

© पूजा मिश्रा

स्वरचित

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