पहली तनख्वा's image
Poetry1 min read

पहली तनख्वा

PnktiPnkti February 28, 2022
Share1 Bookmarks 0 Reads1 Likes
आज पहली तनख्वाह आने पर,
खुश तो मैं जरूर हूं,
पर ये भी सोचने पे मजबूर हूं,

तू मेरी उमर का ही था शायद...

जब बचपन मेरा बहार था,
किया तूने पुरा हर ख़्वाब था
मेरी फरमाइशें ज़रूरतों से मोल के,
अपने जेब के सारे सिक्के टटोल के

तू धूप में जलता रहा, 
संसार से लड़ता रहा
हर दिन लोकल ट्रेन बदलता रहा,
और एक शिफ्ट extra करता रहा

संघर्ष में जीवन गुज़ारा तूने,
कदमों में डाला संसार सारा तूने
आज खुश तो मैं जरूर हूं,
पर ये भी सोचने पे मजबूर हूं

काश थोड़ा संभाला होता,
मैंने खुद को सुधारा होता
लड़ता नहीं उन रातों को,
समझता तेरी हर बातों को

अब बस ग्लानि से दिल भरा है,
पलकों से सारा समंदर झरा है
आज टूटा मेरा सारा गुरूर है,
तेरी चिनताओं का सारा कुसूर मैं

आज पहली तनख्वाह आने पर,
खुश तो मैं जरूर हूं,
पर ये भी सोचने पे मजबूर हूं!

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts