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आहिस्ता आहिस्ता


 हमारी गज़ल है तुम्हारी क़ातिल अदायें

हमसे नजरें हटा लो तुम आहिस्ता-आहिस्ता।


इस मौत के सफ़र में हम चले है अकेले 

हम दूर चले जायेगें आपसे आहिस्ता-आहिस्ता। 


बद रंग मौसम जवानी कमल़ है

सर्द भरी रातों में यूँ तुम हमको छेड़ो।


तुम्हारी यादों के भंवरो से निकलूँ में कैसे

तुम चले जाओ दूर हमसे आहिस्ता-आहिस्ता। 


हमारी नज़्म इसमें दिल के हैं सरगम़

सीने से लगा कर सुन लो तुम आहिस्ता-आहिस्ता। 


आँखो से आँसू है निकलते मेरे तुम उनको न पोछों

ऐ दोस्त अपने सीने लगाकर सब दर्द ले लो आहिस्ता-आहिस्ता। 

Author

Praveen Kumar Verma


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