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प्रीत का इंसाफ कर दो

piyush15796piyush15796 February 23, 2023
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भारत युवाओं का देश है। यह कविता अह्वान है भारत के सभी युवाओं से-

 

प्रीत का इंसाफ कर दो। (2)

बढ़ रही मानव की क्रूरता

पर है धरा आंसू बहाती।

देख के करुँणा को इसकी

रौद्र रूप सृष्टि दिखलाती।

 

वो विरंची* है व्यथा में,

सोचता क्या भूल हुई?

इस जगत की वाटिका में

जो मनुज-सुमन खिलाए

त्याग कर अपनी सुगंध को

खो गया है किस भँवर में?

 

उस विधाता की वेदना को

हे यति*! तुम दूर कर दो।

हर तरफ बस प्रेम बरसे

तुम प्रणय का यज्ञ कर दो

प्रीत का इंसाफ कर दो। (2)

 

पाप के मझधार में,

है लोक-नैया डोलती

हो नरेन* तुम इस सदी के

हे केवट! इसे पार कर दो

दूर हो हिंसा के बादल

स्नेह का तुम जाप कर दो

प्रीत का इंसाफ कर दो। (2)

 

बढ़ रही कटुता जगत में

एक्य का आहवान कर दो।

है भर गया तम, मानव-मगज में

सत्य का तुम ज्ञान भर दो

प्रीत का इंसाफ कर दो। (2)   

 -- पीयूष यादव

 

यति = ऋषि, एक्य = एकता, मानव-मगज = मानव मस्तिस्क, नरेन = विवेकानंद का नाम, विरंचि = ब्रह्मा, मनुज-सुमन= मनुष्य रूपी फूल

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