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सुनसान सड़क पर चलती औरत

pinki jhapinki jha September 14, 2021
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सुनसान सड़क पर चलती औरत को, 

डर किसी जानवर के मिलने का नहीं ,

डर है कि कोई इंसानी भेड़िया न टकरा जाए ,

पीछा करते कही उसका ठिकाना न जान ले, 

उसके अपनों को न पहचान ले ,

हर अँधेरे किनारों पे सहम जाती है वो ,

सँभालते कभी कपड़ें कभी खुदको ,

अपने घर की ओर कदम बढाती है ,

बस जल्द से जल्द घर पहुँचना चाहती है ,

जहा वो शायद सुरक्षित है ,

वो जानती है कोई आदमी जब उसे देखेगा ,

जरुरी नहीं हर बार सही नज़र होगी ,

सामने कुछ और मन में और कुछ होगा ,

उसे किसी की बेटी, बहु, माँ या घर की इज़्जत नहीं ,

बस एक चीज़ समझा जायेगा ,

कोई अपनी वासना और उसका आत्मसम्मान बस मिटाना चाहेगा ,

देखकर छूकर या किसी और तरह से ,

उसे मलिन करना चाहेगा ,

दुनिया में निकले न वो ,

घर में कैद उसे ही अपनी दुनिया समझे चाहेगा, 

पर वो नहीं रुकेगी ,

तुम हैवानियत फैलाओगे वो दुर्गा बन दमन करेगी ,

वो दुर्बल नहीं द्रौपदी का मनोबल लिए है ,

तृण लिए ही अपनी रक्षा सीता बन करेगी ,

जरुरत पड़ी तो काली बन राक्षश रक्त पीयेगी ,

तुम रावण हो, कौरव हो , रक्तबीज या महिषासुर ,

या हो मानव रूप लिए कोई राक्षश खुदको समझे महान,

वो जननी है तो मरना भी जानती है ,

सहना सिर्फ नहीं चितकारना भी जानती है ,

लगे कमजोर है तो उलटकर देख लो इतिहास और पुराण, 

बस थोड़ी बेबस है वो भी तभी तक ,

जब तक ये सोच न बदलदे की ,

गलती उसके कपड़ो समय या उसकी नहीं ,

बस सोच की है ,

जिसे बदलने की छोटी छोटी कोशिशों में वो लगी है ,

और वो सफल जरूर होगी ,

तब तक याद रखना ,

सुनसान सड़क पर चलती औरत कमजोर नहीं ,

- पिंकी झा 



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