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कहाँ कुछ बात आती है बैठे-बैठे 

सिर्फ़ तेरी याद आती है बैठे-बैठे 


दिन यूँही दफ़्तर में गुजर जाता है 

रात हिज्र में कट जाती है बैठे-बैठे 


तूने कहाँ कभी मुझको है सुना 

तुझे तो बस बात काटनी है बैठे-बैठे 


शाम होते ही दिल फ़िर उदास सा है 

फ़िर तेरी याद आनी है बैठे-बैठे 


- पिनाक मोढ़ा

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