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पाकीज़ा (शायरी - कामिल)

KamilKamil February 2, 2022
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तू पाकीज़ा है, तेरी हर आदत की तर

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आज एक दफा तफ़्सील-ए-हयात करने बैठे,

जो कुछ हासिल किया और उसे याद करने बैठे;

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दिल में रह-रह कर धुआँ सा उठता है,

कभी तेरे होने का सबूत मिलता है;

साँस खींचू अगर तो हवा करती है,

उठते धुएँ में फिर धुआँ करती है;

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एक अर्से समेटी शोहरत अज्दाद ने,

हम रोज़-ब-रोज़ उसे बदनाम किए हुए हैं;

रोज़ी-रोटी दाना-पानी सब छोड़ छाड़ कर,

तेरी हसरत में जिंदगी हराम किए हुए हैं,

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एक इश्क़ मुकम्मल होता है, दीदार-ए-सनम से यहाँ,

हर रोज़ बिना इज़हार हुए,

एक दिल क़त्ल होता है, मिज़ाज-ए-सनम से यहाँ,

हर रोज़ बिना इंकार हुए;

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​मेरे अंदर झाँक के देख तुझे क्या दिखता है,

तेरा अक्स दिखता है, या मेरा इख़्तिताम दिखता है;

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बस फिर उसने पलकें झुका लीं,

और दोबारा हमें जीना याद आ गया;

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कभी चाँद, कभी तारे, कभी आसमाँ की ख्वाहिश होती है,

तेरे इश्क ने दूर- दराज़ों की, चाहत रखना सिखा दीया;

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हसरत-ए-सनम बसरत-ए-तन्हाई

तरस किसकी किस्मत पर हो, हम अक्सर ये सोचा करते हैं;

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तेरे दिल में नहीं तो न सही,

मेरा दिल काफी है हम दोनों के लिए;

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तुझे देख में साँसें लेना भी भूल गया,

अब तक जैसे ये कोई काम रहा हो;

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दो पल तेरा नाम मेरे नाम से जुड़ा,

ज़िंदगी बीत गई दो पल जीते जीते;

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चढ़ता है कोई महताब मूक जैसे आसमाँ पर,

आना तू मेरे दिल में, दबे पाँव उसी तरह;

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अब बंद भी करो रोज़-रोज़ ख़्वाबों में आना.

एक अर्सा बीत गया 'कामिल', हक़ीक़त भूले;

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तेरे इश्क़ में गुस्ताख़ियां बहुत की ज़माने के साथ,

तुझे अपना बना लेना, उनमें सबसे मशहूर हुई;

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दर्द-ए-बयां को कोशिशें बहुत की,

स्याही फैला गई कलम, हर बार रोते-रोते;

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नींद का भी बस इतना ही करम रह गया,

जो ख्वाब न दिखाए उसके, तो पूरी नहीं होती;

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जीत पैमाना है अलग सबकी नज़रों में,

जो इश्क़ करते हो, तो सिकंदर हो तुम;

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जिस रात मैंने तारों से तुम्हें माँग लिया,

न टूटने की ख़्वाहिश तुम्हें देख, ये हर रोज़ किया करते हैं;

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क़त्ल-ए-आम बड़ा आम हुआ,

रोज़ा मुँह दिखाई का शायद, तोड़ दिया उसने;

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बचपन वो चिराग है जो जले तो काएनात रोशन हो,

इसकी आग से सिकी रोटियाँ, पेट नहीं भरा करती;

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महज़ दो पल की बात थी जो उसने ज़ुल्फ़ें खोली,

यकीं करो मेरा, मौसम बदलते देर नहीं लगती;

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तेरे ज़िक्र से ज़ीनत-ए-गुज़र है,

हैरत है वरना, गर कोई हाल पूछ ले;

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