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मैं लिखता हुँ उन लफ्जों को 
जिन्हें शायद यूँ बयां कर पाना आसान नहीं 
गुजरता था जिनकी गलियों में दिन सारा 
अब उनका ही दिखता कहीं मकान नहीं

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