पावस रानी's image
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आज छम-छम सुनी तुम्हारी पायलों की; लगा जैसे किसी मीठे स्रोत से निकली हैं, इधर-उधर से, सर्वत्र से। हृदय में भय था कहीं तुम चली गई तो? 
कोई प्रेम के आयामों में सूर्य देखता है, कोई हिम, तो कोई हिमा, तो कोई उषा! मुझे तो दिखती है-रानी, पावस रानी। उसके घुँघरुओं की ध्वनि ज्यों ही कर्णपतित होती है, प्रेम का ज्वार उत्पन्न हो जाता है। वो स्वतंत्र, निर्भीक सुन्दरी, अरण्यानी के आँचल में नृत्य करती हुई, वृक्षों की वादियों में विचरण करती हुई कितनी मनोरमा जान पड़ती है!
 प्राकृतिक दर्शन पटहीन होता है; पट जो नेत्रों के बीच हो, पट जो शरीरों के ऊपर हो। वास्तविक मिलन तो पटहीन ही होता है। नग्न तन से फिसल-फिसल कर गिरते घुँघरू धरती पर गिरकर जो प्रेम की ध्वनि देते हैं, उन्हें तो मम इव ज्योति के शलभ ही समझ पाते हैं। चातक के तप को भला अन्य क्या समझ पाएँगे! विनाडीहीन बुद्धि क्या जाने हरितवर्ण के वस्त्र नग्न शरीर पर लहराते कितने अच्छे लगते हैं। ये नग्नता ही प्रेम है, प्रेम ही सत्य है और सत्य हमेशा नग्न होता है। 'नग्न' शब्द सुनकर वस्त्रहीन मानव देह की कल्पना करने वाले इसके आयामों को क्या जाने!

'सूर' की सहज प्रवृत्ति प्रेम वर्णन से मैं बहुत प्रभावित हूँ। उनका 'मधु' और 'मधुमक्षिका' मुझमें घर कर चुका है। प्रेमी मधुमक्षिका की भाँति मधु मे डूब जाता है; यह प्रेम का मधु है, जिससे चाहते हुए भी वह बच नहीं पाता। प्रीति में बँधा मनुष्य मूढ़ समझा जाता है, अतः मनुष्य अपनी प्रीति को प्रियतम् तक सीमित रखे अन्यथा परिणाम भुगतने को तैयार रहे। 
खैर, इन सांसारिक लाज-लज्जा और लोकमाया की बातों को छोड़कर ये ईहग तो बस तुममें रमना चाहता है।
बस तुम अपनी शीतल भुजाओं से मुझे ऐसे ही सहलाती रहो, पंखों पर मेरे ऐसे ही रस उडेलती रहो और मैं उपमानों की ऐसी श्रृंखला का नित्यप्रति सर्जन करता रहूँ....

© Pandit Keshav 

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