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ओ सुंदरी सदानीरा!

Pandit KeshavPandit Keshav September 8, 2022
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ओ कोमल कान्ति वाली रतिरूपा,
ओ विशालाक्षा सुन्दरी नयनाभिराम!
वामना सी, कामना सी प्रतीत होती,
ओ वृत्तों के वर्ग का जगाती वाम

कलियों से काजल लगा यों नीर बहा,
सतत्-सतत् सुन्दर-सुन्दर कहती हो। 
ओष्ठों पर सरस बहाने वाली तुम,
ओ सुन्दरी कहाँ रहती हो?

ओ दिनकर के दिन की आभा सी,
ओ पूनम के चाँद की चंद्रिका।
किस हेतु तुम बहा करती हो, 
किसकी मिटाती तुम मरीचिका?

ओ बारिस की बूँदों में बीजता भरने वाली,
छम छम नुपुर बाँधकर नाचती पावस रानी।
किस हेतु तुम जल्दी-जल्दी जाती, 
किस हेतु बहाती अपना ये पानी।

तुम्हारा ये श्वेत सन्दर वर्ण खींचता मुझे, 
डुबोता मुझको स्वयं में मानो मक्षिका मधु में जाती। तुम भैरव की मधुमाधवी सी ओ रागिनी,
तुम बाती दीये की जो पतंग को स्वयं में खींच लाती।

तुम सदा निर्मल सी स्वच्छ बहा करती हो,
धौत-धौत से धूलों को धोकर तुम।
सविता सी आभा बिखेरती हुई तुम, 
स्वयं में समेटती अनेक ताल और पोखर तुम।

ओ सदानीरा आज है तुम्हारी बारी, 
जो मुझको बहाती है, बहलाती है
आज मुझमें वह बहकर, 
सदानीरा से सुन्दरी कहलाती है।

©Pandit Keshav

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