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मातृत्व की टूटी-फूटी झलक

Pandit KeshavPandit Keshav September 3, 2022
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कल या परसों, या शायद प्रत्येक दिन देखता हूँ, सड़कों पर मातृत्व की अलग-अलग विधाओं को। पर उस दिन के दृश्य ने मुझे विचलित कर दिया, ठेले पर अपने बच्चे को बैठाकर वो बाल बना रही थी, उम्र में मेरी माँ से आधी से कुछ ज्यादा ही होगी, पर दरिद्रता और शरीर की दशा में वह मेरी माँ के समक्ष प्रौढ़ लग रही थी। उसकी आँखों में आँसू नहीं थे, बल्कि अथाह परिस्थितियों व विपन्नताओं के गहर काले 'डार्क सर्कल' थे। उसके पतले और कुपोषित हाथ कम काले और कम घने बालों को सुलझा रहे थे। उसका निस्तेज मुख प्रसन्न हास्य की अभिव्यक्ति दे रहा था। सम्भवतः वह अपने बालक से कुछ कह या हँस रही थी, मेरी माँ की तरह। जब माँ कंघी से अपने घुँघराले काले-सफेद बालों को सुलझाती है तो मुझमें पुत्रत्व हिलोरे लेने लगता है। सम्भवतः वह भी अपने बालक के साथ यही कर रही हो।

           असंख्य भावनाओं, आदर्शों और सभ्यताओं की जीवन शैली में जीने वाले कितने लोगों को यह दारुण दृश्य देखकर वात्सल्यता जकड़ पाती है? यह तो बस मैं और उसका पुत्र ही समझ सकते हैं। बीहडों की दुनिया में और आशा भी क्या की जा सकती है संसार भर की स्याही बीत जाएगी और कागज समाप्त हो जाएँगे इस एक पलक झपकने के समय में देखे गए दृश्य को वर्णित करने में।
पैसे से दारुण हो सकती है लेकिन वात्सल्य से कभी नहीं - माँ।

©Pandit Keshav

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