छिटका पहाड़'s image
Poetry1 min read

छिटका पहाड़

Pandit KeshavPandit Keshav September 2, 2022
Share0 Bookmarks 258 Reads2 Likes
मेरे गाँव में, किनारे पर,
बसा है आँचल का एक टुकड़ा
आँचल, जिसे धरती ओढे़  है!

 हरे रंग का सोना 
और बहती हुई 'चमकती चाँदी',
कुछ टूटे खण्डहरों को 
समेटे हुए अपने में।

स्थिर, शान्त खड़ा है वो;
अस्थिरता दिखती उसकी, 
झञ्झाओं के झौंकों में।
अशान्ति दिखती उसकी,
मोरों की कूकों में।

और फिर वो उड़ता भी 
पंछियों में पर बनकर,
कुलाचें वो भरता
हिरणों में पैर बनकर।

वो स्वयं रस है और रसिक भी 
रस स्वयं में से वो बहाता भी
 मीठा, धौत, श्वेत, स्वच्छ,
सतत्, निर्मल, कान्तिमय।

और घाटी में वो समेटे है
एक बूढ़ा और अनुभवी बरगद,
शताब्दियों से जो वहीं खड़ा है,
अपनी बड़ी दाढ़ी के साथ 
जटाओं को लटकाए हुए।

छिटका हुआ, अलग सा 
वो पहाड़ खड़ा है मेरे पास में,
उगते सूरज को निहारता 
और डूबते को डुबाते हुए....
यों कुछ कहता वो मुझे 
बारिसों को झरनों में बहाकर!

©Pandit Keshav

No posts

Comments

No posts

No posts

No posts

No posts