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वो चाय की चुस्की,

दोस्तों का मेला,

वो भी क्या वक्त था जब कोई नहीं था अकेला।


खाली थे हमारे जेब,

पर चाय वाले का दिल बड़ा था,

एक बड़े से रजिस्टर में सब पे उधार चढ़ा था।


पाता नहीं कब आते थे और कब जाते थे,

हॉस्टल के कमरे से ज्यादा हम रेड़ी पे नज़र आते थे।


वो उधर चाय का स्वाद आज भी जेहन में बाकी है,

अनायास मुस्कुराने के लिए वो याद ही काफी है।


वो चाय की चुस्की,

दोस्तों का मेला,

वो भी क्या वक्त था जब कोई नहीं था अकेला।

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